Sunday, August 21, 2022

जौं घर टूटल सुख नहि बाँचत

बचपन  समय बिताओल कोना?
कियो शिखर पर आओल कोना?

बाँटू   अनुभव   घर - पड़ोस   मे 
अप्पन   डेग   बढ़ाओल   कोना?

वर्तमान     झाँकी      इतिहासक
के, की, कखन सिखाओल कोना?

जिनक  छलहुँ   सहयोगी  हुनके
आँखिक पानि सुखाओल कोना?

प्रेम  आपसी   मूल  छी  घर  के
परिजन आगि  लगाओल कोना?

जौं  घर  टूटल  सुख नहि बाँचत
बूझियौ   चैन  लुटाओल  कोना?

नहि  उपदेश  बुझु  अनुभव केर 
गजल  सुमन  ई गाओल कोना?

हम प्रतीक्षित ठाढ़ छी

हुनक  स्वागत, आगमन  मे, हम प्रतीक्षित ठाढ़ छी
भेद  केलन्हिं  जे  स्वजन मे, हम प्रतीक्षित ठाढ़ छी

गाम  केर  हर  वर्ण  मे  छल, आत्मिक  संबंध  यौ
आय आपस  केर जलन मे, हम प्रतीक्षित ठाढ़ छी

आदमियत केर  बिना छथि, आदमी लागल एखन
एक  दोसर  केर  दमन  मे, हम  प्रतीक्षित ठाढ़ छी

गाम  सँग  परिवार  टूटल,  विश्व - ग्रामक  मोह  मे
मस्त  सब  अपने भजन मे, हम प्रतीक्षित ठाढ़ छी

प्रेम  आपस  मे  जौं  बाँचत, ई  जगत  सुन्दर रहत
नित सुमन लागल जतन मे, हम प्रतीक्षित ठाढ़ छी

नीक लोक केर बड़ अभाव छै

पोस्टरबाजी केर प्रभाव छै
आबयवाला फेर चुनाव छै

वोट देल जाय एहि बेर किनका
भेटय, एक सँ एक सुझाव छै

लागत गप सँ एक्के छी हम
सभक मोन मे किछु दुराव छै

गाम, देश, कोनो चुनाव हो
नीक लोक केर बड़ अभाव छै

क्षणिक लाभ वोटर केँ जत्तऽ
ताहि तरफ हुनकर बहाव छै

खा कऽ, पी कऽ छुटभैया केर
भरि चुनाव मे अलग ताव छै

जागू सुमन जगाबू सब केँ 
न्यायपूर्ण मानव स्वभाव छै

पुनः राम आबथि सासुर मे

ज्ञानक दीप जरय घर घर मे, सभहक सुखमय जीवन हो
संस्कार सँ  पूरित  मैथिल,  सकल  जगत  मे  भगवन हो

विद्यापति, मंडन केर धरती, बिनु साहित्यक लागय परती
अपसंस्कृति सँ दूर सदरिखन, जनक-सुता केर आँगन हो
ज्ञानक दीप जरय -----

अपने सँ  घोषित  बुधियारी, खूब  बढ़ल अछि ई बीमारी
द्वेष - राग सँ दूर स्वजन हो, सभहक सज्जन परिजन हो
ज्ञानक दीप जरय -----

टाका पैसा  खूब कमेलहुँ, भाव सुकोमल ओतेक गमेलहुँ,
जागय नहि पशुता समाज मे, ठीक सँ एहि पर चिन्तन हो
ज्ञानक दीप जरय -----

व्यथित सुमन केर मोनक गीता, गाबि सुनेलहुँ मैया सीता
पुनः राम  आबथि  सासुर  मे,  स्वागत मे  मैथिलजन हो
ज्ञानक दीप जरय -----

पहिल प्रश्न रोटी अछि जग मे

जे   सूतल   से   जगबे  करतय
राज - काज  सब चलबे करतय

पहिल  प्रश्न  रोटी  अछि  जग मे
घर  सँ  लोक  निकलबे  करतय

कर्मक फल  सँ  के बाँचल अछि
नीक  करू  यश  बचबे  करतय

आय अन्हरिया काल्हि ईजोरिया
मौसम   रोज   बदलबे   करतय

संस्कार    छूटल    अप्पन   तऽ 
चैन   हिया   के   जरबे  करतय

नेना - भुटका  सुख  सँ  जीबय
अपन  स्वप्न  सब गढ़बे करतय

बढ़ू  सूमन  बस  नेक  सोच सँ 
शेष  लोक  भी  बढ़बे  करतय

एक दुनिया मे हमहीं टा बुधियार छी

हम  बकलेल  छी,  अहाँ  होशियार  छी
एक  दोसर  लय  जीबय  के आधार छी

दुख सँगहि चलत सुख भेटय नहि भेटय
दुख  सँ लड़ियो कें जीबय लऽ तैयार छी

किछु  हँसैत  लोक सँ गप्प करियौ, बुझू
दुख  नुकाबय  के  मुस्कान  हथियार छी

काटि लेलहुँ हम जिनगी भरम पोसिकय
एक  दुनिया मे  हमहीं  टा  बुधियार  छी

कने किचकिच तऽ आपस मे हेबे करत
ई  तऽ  जीवन - कला  केर  विस्तार छी

तीत - मीठक  खजाना  ई जिनगी हमर
दुख जीयब  सिखौलक,  दुखे  यार  छी

ओढ़िकय  हम  हँसी  चलू  आगां  बढ़ी
अहाँ श्यामल के मोनक सुमन-प्यार छी

भेद कियै अछि स्वजन मे?

सोचियो  अपने  सँ  मन  मे, हम कही वा नञि कही
भेद  कियै  अछि  स्वजन मे, हम कही वा नञि कही

एक  दोसर  सँ  कही  हम, काज  निक्के  टा केलहुँ
छी  मुदा  झूठक  व्यसन मे, हम कही वा नञि कही

स्वार्थवश नित  प्रार्थना सँग, नित खुशामद हम करी
बात  त्यागक बस कथन मे, हम कही वा नञि कही

मूल्य - बोधक  बात  छूटल, धन प्रमुख भेलय एखन
राति दिन सब एहि जतन मे, हम कही वा नञि कही

अगिला  पीढ़ी  संस्कारित, भेल  नहि  तऽ  सोचियौ
आगि लगि जायत सुमन मे, हम कही वा नञि कही