Wednesday, October 31, 2012

जागत सकल समाज


उत्साहित युवजन सुमन, ताकि रहल आयाम।
भाव सभक मोनक बनल, विकसित हम्मर गाम।।

चैनपुर छी गाम हमर, जिला सहरसा बीच।
नेता, मंत्री जे सुमन, काज हुनक छल नीच।।

देर, मुदा जागल युवा, भरल मोन मे जोश।
बात खुशी के ई सुमन, बाँचल सभहक होश।।

शुरू करब नहि अछि कठिन, जारी राखब काज।
निश्चित फल भेटत सुमन, जागत सकल समाज।।

आँकब नहि कम बूढ़ केँ, भेटत सब सहयोग।
औषधि छी अनुभव जखन, सुमन भगाबथि रोग।।

Wednesday, October 24, 2012

नीलकंठ बनू


विजया दशमीक दिन। गामक मूर्ति-विसर्जनक पश्चात, गामक लोक सब गजानन बाबूक दरवाजा पर जमा भेलाह। बुझियो जे आन दिनका जेकाँ एक तरह सँ चौपाले लागि गेल। एक ग्रामीणक प्रश्न छल जे आय सम्पूर्ण देश मे विजया दशमीक पर्व अनेकानेक तरीका सँ मनाओल जाऽ रहल अछि। परन्तु अपना सभहक गाम घर मे नीलकंठ पक्षी केँ प्रयास पूर्वक ताकल जाइत अछि पुनि ओकरा उड़ाओल सेहो जाइत अछि कियैक? 

गजानन बाबू बजलाह - देखियो नीलकंठ सँ हमरा सभहक जीवनक बहुत किछु जुड़ल अछि। हमर सभहक पूर्वज बहुत दूरदर्शी छलाह आ प्रतीकात्मक ढंग सँ अपना रिवाज मे बहुतो चीज एहेन जोड़ने रहथि जकर सरोकार आम-जिनगी सँ होइत छल। गाम घर मे आजुक दिन लोक सब नीलकंठ पक्षी केँ देखि अप्पन अप्पन जतरा (यात्रा शब्दक देशज रूप) बनाबय छथि आ नीलकंठक उड़य केर दिशा सँ भरि सालक जतरा केहेन रहत? एकर अनुमान करबाक लौकिक परम्परा सेहो अछि। 

नीलकंठ एक बहुत उपयोगी पक्षी होइत अछि। खेत मे लागल फसल कें नुकसान पहुँचाबयबला जत्तेक कीड़ा, मकोड़ा एत्तेक तक की साँपो, नीलकंठक आहार थीक। आय-काल्हि जे खेत मे कीटनाशकक नाम पर जहर छीटल जाऽ रहल अछि ओकर कोनो जरूरते नहि छैक जौं नीलकंठ पक्षी टा बाँचल रहय। मुदा सुनबा आ देखबा मे आबि रहल अछि जे गिद्ध जेकाँ आय-काल्हि नीलकंठो अलोपित भऽ रहल अछि। देखारे नहि पड़ैत अछि। ई सबटा बेसी फसल आ बेसी दूधक कारणे जे सगरे जहर छीटल जाऽ रहल अछि, ओकरे परिणाम छी। जहिना गिद्ध एक उपयोगी पक्षी अछि, जकरा एक प्राकृतिक "सफाई-कर्मचारी" सेहो कहल जाइत अछि, तहिना नीलकंठ पक्षी सेहो फसल सहित मानवताक लेल बहुत उपयोगी अछि। गिद्धक ऊपर तऽ सरकारक ध्यान गेल आ आब ओकर सरकारी संरक्षण आ अभिवर्धनक उपाय भऽ रहल अछि। मुदा नीलकंठक बारे कोनो चर्चा कतहु नहि अछि? 

प्रायः सब गाम मे अपने सब देखने हेबय जे गामक प्रवेशे-द्वार पर नीलकंठक मंदिर होइत अछि। मानू जे साक्षात नीलकंठ ओहि गामक रखबारी कऽ रहल छथि। ओहिनहियो हमरा "नीलकंठ" शब्द सँ बहुत प्रेम अछि। हमरा, अहाँ केँ वा किनको दिन मे कतेक बेर नीलकंठ बनऽ पड़ैत अछि? कहियो सोचने छिये?

गजानन बाबूक बजबाक क्रम जारी छल - समुन्द्र मंथनक पश्चात् जखन कालकूट जहर निकलल तखन देवगण चिन्तित भेलाह जे आब एहि जहरक कोन उपाय हेतय? बाहर फेंकने सँ संसारक  नाश भेनाय निश्चित छैक। विस्तार मे नहि जाय छी कियैक तऽ ई खिस्सा सब गोटय जनिते होयब। भगवान शंकर तैयार भेलाह आ अपना कंठ मे ओहि कालकूट जहर केँ योगबल सँ स्थान देलखिन्ह जाहि कारणे हुनक कंठ नीला भऽ गेल आ हुनक नाम ताहि दिन सँ नीलकंठ भऽ गेल। जहरक ताप कम करबाक लेल हुनका जटा मे गंगा, माथा पर चन्द्रमा आ गरदैन मे साँप (सब शीतलताक प्रतीक) आबि गेल।

गजानन बाबू पुनि बजलाह -आब अपना अपना जिनगी मे सब सब कियो ईमानदारी सँ सोचय जाऊ जे परिवार होय वा समाज, आफिस होय वा बाजार - हमरा सब केँ कत्तेक बेर ओहेन काज विवशता मे करऽ पड़ैत अछि जे हम सचमुच हृदय सँ नहि करऽ चाहैत छी। मात्र परिवारक, समाजक, नौकरीक, व्यापारक रक्षा लेल। दोसर शब्द मे कही तऽ जहर पीबऽ पड़ैत अछि। कहू फुसियो कहय छी? आब सब कियो अपना मोने मोन सोचियो जे हमहुँ सब रोजे नीलकंठ बनय छी कि नहि? जाबत नीलकंठ नहि बाँचत आ जाबत हमसब नीलकंठ नहि बनब ताबत जिनगीक जतरा कोना बनत यौ? ताहि हेतु नीलकंठ बनय जाऊ। कोनो पारम्परिक बात केँ जीवन सँ जोड़ि देनाय ई गजानन बाबूक विद्वता आ तर्क-शक्तिक कमाल थीक जाहि सँ सब ग्रमीण प्रायः परिचिते छथि।

Saturday, October 13, 2012

हम पान आ प्राण संगहिं छोड़ब।

दिन राति जतऽ देखू ततऽ जाने अनजाने प्रायः सब कियो अप्पन अप्पन विशिष्टता (अहंकार सेहो कहि सकय छी) स्थपित करय मे लागल रहय छथि। बस अवसर भेटबाक चाही। एक महिला मित्र (या मित्राणी जे कही) सँ बातचीत होइत छल। अप्पन विशिष्टताक बोध करबैत बजलीह - हम एहि कारणे अमुक संस्था छोड़ि देलहुँ, अमुक कारणे अमुक संगठन। हमरा कनियो टा अनर्गल बात बर्दाश्त नहि होइत अछि आदि आदि ---। कने देरक बाद पुनः शुरू भेलीह हम चाय छोड़ि देलहुँ, हमरा आब भोजनो सँ ओतेक अनुराग नहि। यानि जेहेन प्रसंग आ परिवेश तेहने अप्पन विशिष्टता पर हुनक वक्तव्य। हमहुँ कतेक सुनितहुँ? एकाएक मुँह सँ निकलल - मित्र अहाँ बिल्कुल ठीक कऽ रहल छी। भने धीरे धीरे सब किछु छोड़य केर आदत बना रहल छी। एक दिन तऽ ई देह आ दुनिया सेहो छूड़ैये पड़त ने। नीक अछि छोड़बाक पूर्वाभ्यास भऽ रहल अछि। हमर महिला मित्र लजाऽ गेलीह।

जीवन जीयब एक धर्म छी। आ धर्म की? विद्वान लोकक मुँह सँ सुनने छी जे "यः धारयति स धर्मः"। अर्थात् धर्म धारण करबाक नाम थीक, नहि की छोड़य वा पलायन केर। जिनगी सँ हम सब कियो रोजे रोज टकराबय छी तखन "जीवन-धर्मक" पालन सम्भव भऽ रहल अछि आ हम सब अपना अपना ढंगे जीबि रहल छी। बहुतो बेर इहो सुनने छी चौरासी लाख योनि भ्रमणक पश्चात मानव जीवन भेटैत अछि। आब अहीं सब कहय जाऊ जे एतेक कठिन सँ मानव-जीवन भेटल तखनहुँ यदि जीवन-धर्मक पालन नहि केलहुँ तऽ की केलहुँ?

प्रायः हम सब कम सँ कम एक पत्नी सहित धिया-पुता, भाय-बहिन, माता-पिताक सँगे एक्के घर मे रहय छी। कम या बेसी आपस मे खटपट होइते रहय छैक। तऽ की हम अप्पन परिजन केँ छोड़ि दैत छी? बहुमतक जवाब भेटत नहि। मुदा जे छोड़ि दैत छथि हुनका समाज मे नीक स्थान कहियो भेटय छै की? बिल्कुल नहि। भबिष्यो मे एहने स्थिति शाश्वत काल तक रहत, ई हम सब उम्मीद कऽ सकैत छी। कारण समाज शास्त्रक हिसाबें मनुक्ख केँ एक सामाजिक जानवर कहल गेल अछि। अप्पन गज़लक ई पाँति याद आबि गेल -

भेट जाय भगवान किंचित्, की भेटत इन्सान यौ
मुँह सँ जे लोक अप्पन, मोन सँ बेईमान यौ

ईमानदारीपूर्वक कहऽ चाहैत छी जे खूब विचार केलाक बाद हम अपना बारे मे कहि सकैत छी जे आयधरि हमहुँ "इन्सान" नहि भऽ सकलहुँ। बस पैघ लोकक बनाओल रस्ता पर चलबाक प्रयास भरि कऽ रहल छी। मोन मे अछि यथासम्भव "जीवन-धर्मक" निर्वाह करी। ताहि हेतु कोनो चीज छोड़य सँ बेसी धारण करवाक प्रवृत्ति अछि।

हम खूब मोन सँ पान खाय छी। जीवनक शुरुआती दिन कहियो पानक डाली मे सुपारी नहि तऽ कहियो पानक पात मुरझायल। दिक्कत होमय लागल तऽ प्रयास कऽ सुमन जी (पत्नी) केँ पान खेनाय सिखेलहुँ। आब हमरा सँ बेसी हुनके बेगरता रहैत छन्हि। हमर दिक्कत खतम। किछु दिन पूर्व एहि "पान-प्रेमक" प्रभाव सँ दाँतक डाक्टर लग जाऽ पड़ल। डाक्टर साहेब सलाह देलथि जे अहाँ पान छोड़ि दियऽ। हमरा मुँह पर मुस्कान देखि डाक्टर साहेब पुनि बाजि उठलाह हँसलहुँ कियैक? हम बजलहुँ - डाक्टरक सलाह तऽ मानब हमर मजबूरी अछि ने? नहि तऽ ----। डाक्टर साहेब बजलाह - नहि तऽ की विचार अछि? हम बजलहुँ - यदि हम्मर विचारक बात होय तऽ हम पान आ प्राण एक्के सँग छोड़ब। डाक्टर साहेब हँसय लगलाह।

Wednesday, October 10, 2012

अप्पन अप्पन - देखू दर्पण

गजानन बाबूक दरवाजा पर साँझक समय आय पुनः चौपाल सजल छल। गामक लोक सब अपना अपना काज सँ निवृत भऽ सब दिनक भाँति चौपाल मे आबि बैसल रहथि। आय गजानन बाबू समाज मे व्याप्त भ्रष्टाचार आ अन्य बुराई पर चिन्तित रहथि। भ्रष्टाचार सँ सम्पूर्ण देश मे हहाकार मचल अछि। अखबार, रेडियो, टेलीवीजन जतऽ देखू ततऽ भ्रष्टाचार सम्बन्धी खिस्सा? की भऽ रहल छैक समाज आ देश मे। जिनका देखू वो भ्रष्टाचार पर व्याख्यान दऽ रहल छथि सँगहि ओकर निदानक उपाय सेहो सुझा रहल छथि अपना अपना हिसाबें। किनको ज्ञान किनको सँ कम रहन्हि तखन ने? पंचायत सँ दिल्ली धरि जिनका अवसर छन्हि, लूटय मे लागल छथि। पहिने सामाजिक व्यवस्थाक कारणे लोक केँ चोरि, छिनरपन सँ लाज आ डर लागैत छलय। परन्तु आब? आब तऽ ई हमर समाजक व्यवस्थाक एक अभिन्न अंग बनि गेल अछि सँगहिं टाका सँ प्रतिष्ठा सेहो भेटैत अछि।

गजानन बाबू ग्रामवासी केँ सम्बोधित करैत बजलाह - अपने सब कनेटा ई बताऊ जे पुलिस हो वा नेता, कलर्क हो वा कलक्टर ई सब तऽ हमरा समाजेक लोक होइत छथि कि नहि? आय जे किछु गड़बड़ भ्रऽ रहल अछि देश वा समाज मे ताहि मे हिनके भूमिका प्रत्यक्षतः देखवा मे आबि रहल अछि। एना कियैक भेल? आ कोना भेल? विचारणीय अछि। हमरा याद आबैत अछि बहुत पुरनका बात। अपने गाम मे एक छलाह सुक्कन बाबू जिनक प्रयास सँ आय अपना गाम मे हाइ स्कूल, डिस्पेन्सरी, खादी-ग्रामोद्योग केन्द्र आदि चलि रहल अछि। गामक लोकक उपकार भऽ रहल छैक। मुदा सुक्कन बाबू केँ अपना जीबैत कहियो लोक मोजरे नहि देलखिन्ह। जानय छी कियैक? कियैक तऽ सुक्कन बाबू अपना जिनगीक शुरूआती दिन मे ताहि दिनक सामाजिक व्यवस्थाक विपरीत वर्जित काज केने रहथि टाका कमाबय खातिर। सुनबा मे तऽ इहो आबैत अछि जे वो बगरो केँ जाल मे फँसा कऽ फलक कहिकय बेचैत रहथि। खैर--- हमर अभिप्राय ई कखनो नहि जे एक दिवंगत आत्माक निन्दा करी। ओहिनहियो हुनका सनक "युग-पुरुष" आब कतय? हमर अभिप्राय छल जे पहिलुका दिन मे अहाँ टाका सँ कतबो मजबूत भऽ जाऊ मुदा सामाजिक वर्जनाक अतिक्रमण केला पर अहाँ केँ समाज मे जिनगी भरि मान्यता नहि भेटत। ई डर सामाजिक व्यवस्था केँ ईमानदार बनेने छल। मुदा आब ई डर सभहक मोन सँ निपत्ता भऽ गेल अछि जे कारण अछि समाज मे आजुक सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचारक।

किछु देर चिन्तनक पश्चात गजानन बाबू अप्पन एक संस्मरण केँ याद करैत बजलाह - पिताजीक मृत्युक पश्चात हमरा मैट्रिकक परीक्षाक बादे मात्र सवा सोलह सालक उमरि मे गाम सँ रोजगारक लेल बाहर जाऽ पड़ल। पहिल बेर गाम सँ बाहर जेबाक कारणे आ गरीबीक डर सँ हम खूब कनैत छलहुँ। गामक बाहर होइते सीताराम कक्का भेटलाह। हुनका प्रणाम केलहुँ तऽ वो आशीर्वादक पश्चात कहलन्हि जे बेटा अहाँ कनय छी कियैक? खूब हूब सँ जाऊ। नौकरी भेटबे करत। बस एकटा बातक ध्यान राखब जे "जीभ" आ "आचरण" पर सब दिन नियंत्रण राखब। अहाँ सब दिन सुख करब। गजानन बाबू बातक क्रम केँ आगाँ बढ़ाबैत बजलाह - हमरा सचमुच जिनगी मे कतेक बेर एहेन प्रलोभन सेहो भेटल। लेकिन सब बेर हमरा एहेन बुझना गेल जे सीताराम कक्का अप्पन पुरनका बात हमरा सोझाँ मे दोहरा रहल छथि आ हमर डेग सीमा रेखा सँ आगाँ नहि बढ़ि सकल।

गजानन बाबू पुनि बजलाह - नौकरीक करीब पंद्रह बरस बादक एक घटना याद आबैत अछि। एक बुजुर्ग व्यक्ति हमरा सँ पुछलन्हि - की हौ गजानन नौकरी करय छऽ? हमर जवाब - जी हाँ। हुनक प्रतिप्रश्न - "ऊपरी कमाय" कत्तेक होय छऽ? हम्मर जवाब - किछुओ नहि। पुनः हुनक निर्मम प्रतिक्रिया - तखन की खाक नौकरी करय छ? ई जवाब सुनितहिं हम अबाक भऽ गेलहुँ। गजानन बाबू बजलाह - देखू एक्के गाम, लोको ओहने मुदा विचारक स्तर पर कतेक परिवर्तन भऽ गेल? कहबाक तात्पर्य जे कोनो बुराई वा भ्रष्टाचारक प्रशिक्षण तऽ किनको सामाजे मे भेटय छै कि नहि? भ्रष्टाचार मे लिप्त तथाकथित लोक केँ गरियेने सँ किछुओ फायदा नहि? वरन् हमरा सब केँ अप्पन अप्पन भीतर मे देखऽ पड़तय ईमानदारी सँ जे हम कतेक ईमानदार छी आ हम अपना अगिला पीढ़ी केँ की प्रशिक्षित कऽ रहल छी। रोज एक बेर अप्पन अप्पन अन्तर्मनक दर्पण देखबाक जरूरत अछि सब गोटय केँ। नहि तऽ ई सामूहिक सामाजिक सांस्कृतिक अवनयनक युग सँ बाँचब मुश्किल। 

Wednesday, September 19, 2012

बन्द : आम लोकक हित वा अहित?

मँहगाई रोज बढ़ले जाऽ रहल अछि। कहियो डीजल कहियो रसोई गैस तऽ कहियो पेट्रोल। कोन दिन कोन चीजक दाम सरकार बढ़ाऽ देत कहब कठिन? लोक तबाह भऽ गेल अछि जोड़ैत जोड़ैत। हमरा तऽ कखनो काल लागैत अछि जे आदमी छोड़ि सब किछु मँहगे भऽ रहल अछि। आय गामक चौपाल पर गजानन बाबू आबितहिं निराशा-भाव सँ बाजब शुरू केलन्हि। अखबार, रडियो आ कहियो कहियो टी० वी० (बिजलीक अभाव मे देखवाक संयोग कम्मे) सँ अर्जित नित्य-ज्ञानक वमन चौपाल पर गामक लोकक सोझाँ मे केनाय हुनक नियमित कर्म छन्हि। लोको सब हुनका आदत सँ परिचित छथि। लेकिन एहनो बात नहि जे गजानन बाबू खाली गप्पे टा दैत छथिन्ह। देश, राज्य आ समाजक प्रति हुनक विचार सँ सोचबाक लेल लोक सेहो विवश भऽ जाइत छथि।

आब लियऽ? भारत बन्दक आयोजन पुनः भेल बहुत ओहेन राजनैतिक दल आ संगठन द्वारा जाहि मे अधिकतर के विश्वसनीयता आमजनक बीच मे लगभग खतमे बुझू। ओहिनहियो साल भरि तऽ बन्दे बन्दक घोषणा होइत रहैत छैक। कखनो मँहगाई बढ़बाक नाम पर तऽ कखनो भ्रषटाचारक नाम पर। कहियो सरकारी तंत्रक विफलताक नाम पर तऽ कहियो नेताक रूप मे परिवर्तित समाजक कुख्यात अपराधीक "शहीद" भेला पर। कतेक बन्द आ कहिया तक? गजानन बाबू चिन्तित स्वर मे अप्पन वक्तव्यक श्रृंखला जारी राखलन्हि। लोकतंत्र मे सरकार आ व्यवस्थाक खिलाफत करबाक लेल हमरा किछु रास्ता आ तरीका गाँधी बाबा द्वारा सिखओल गेल जाहि मे बन्दक आह्वान् सेहो अछि। परन्तु एहि अधिकारक प्रयोग कखन, कहिया आ कोना करी? एकर विगत कतेक दशक सँ निरन्तर अवहेलना भऽ रहल अछि।

गजानन बाबू बजलाह - हम बन्द समर्थक किछु नेता केँ पुछलहुँ जे आखिर ई बन्द कियै? जवाब भेटल जे मँहगाई आ भ्रष्टाचार सँ आम लोक त्रस्त भऽ गेल अछि। आम लोकक हित मे एहि बन्दक आह्वान भेल अछि। प्रश्न स्वाभाविक अछि जे एहेन बन्द मे प्रायः आमे लोक बेसी परेशान सेहो सेहो होइत छथि। हुनक हित की हेतेय कपार? रोज कमाय-खायबलाक रोजी-रोटी छिनेतय। बीमार लोक अस्पताल नजि जाऽ सकतय आ बच्चा सब विद्यालय। पैघ लोक केँ कोनो अन्तर पड़तय की? लेकिन अपना देश मे तऽ बेसी लोक रोज "लूटि आनू कूटि खायबला" छथि। कहू भेल ने मजेदार बात? आम लोकक हित मे बन्दक आयोजन करयबला दल आ संगठन आम लोकक अहिते ने कऽ रहल छैक। हे भगवान। की हेतय एहि देशक? एहि समाजक? आय काल्हि बन्दक मने भेल सद्यः गुण्डागर्दी। बन्दक आह्वान के मतलब "स्वेच्छा" नहि "विवशता" अर्थात् बन्द करय पड़तौ नहि तऽ तोड़-फोड़ शुरू। सभहक अप्पन अप्पन स्वार्थ। सब एक दोसर केँ ठकय मे लागल अछि।
 
स्वतंत्रता आन्दोलनक समय आ बादो मे कतेक बेर बन्दक आह्वान भेल जाहि मे लोक स्वेच्छा सँ सभहक सहयोग भेटल। दल वा संगठनक एहेन विश्वसनीयता छलैक जे बस आह्वानक देरी आ स्वतः-स्फूर्त विरोध शुरू। कियै देखलिये नहि जे अण्णाक आह्वान पर सम्पूर्ण देशक लोक कोना एकत्रित भऽ गेल? हमरो सभ केँ स्वतः-स्फूर्त बन्द आ जबरदस्तीक बन्दक अन्तर बुझऽ पड़तय। गजानन बाबू कहलन्हि जे हमर अभिप्राय ई कखनहुँ नहि जे गलत बातक विरोधे नहि हेबाक चाही? वरन् दल वा संगठन समाजक बीच अपना नियमित क्रिया-कलाप सँ अप्पन विश्वसनीयता बढ़ाबय तखन फेर जबरदस्तीक कोनो जरूरते नहि पड़तय। लेकिन एहि गुण्डागर्दी सँ भरपूर "बन्द" सँ समाज हित सँ बेसी अहिते होयत।

Wednesday, September 12, 2012

अंगरेजी पर सवार हिन्दी प्रेम

आय चौपाल मे गजानन बाबूक चेहरा किछु उखड़ल उखड़ल आ किछु गम्भीर सेहो बुझना गेल। कारण बुझबाक प्रयास केलहुँ तऽ किछु देर बाद बजलाह की कहू? जेहने अपना मिथिला मे मातृभाषा मैथिलीक दशा अछि किछु किछु ओहने हाल राज-भाषा (आयधरि संवैधानिक तौर राष्ट्र-भाषा नहि) हिन्दीक देखवा मे आबि रहल अछि। आय १४ सितम्बर यानि हिन्दी दिवस यानि हिन्दी केँ आजुक दिन सँ सरकारी तौर पर "राज-काजक भाषा" मानल गेल। सँगहि सँग तथाकथित हिन्दी-प्रेमीक एक अनवरत लड़ाय सेहो जे एक दिन हिन्दीओ कम सँ कम हिन्दुस्तान मे राष्ट्र-भाषा बनबे करत। बड़ा विचित्र स्थिति अछि। जहिना साल मे एक दिन हम सब मातृ-भाषा दिवस मनाकऽ अप्पन कर्तव्यक इतिश्री कऽ लय छी बस ओहने खेला राष्ट्रीय स्तर पर सेहो हर साल होइत अछि प्रायः देशक सब सरकारी कार्यालय मे।

गजानन बाबू पुनः बजलाह - अपना देश मे आजादीक बाद जतेक घोषित दिवस अछि सभहक एहने दशा अछि। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयन्ती आदि सनक राष्ट्रीय पर्वक दिन की होइत अछि? बस औपचारिकताक निर्वाह। आओर की? कार्यालयीय स्तर पर जिनक "ड्युटी" लागन्हि से जेबे करताह। या फेर जिनका किछु सम्मान वा पुरस्कारक सूचना भेटैत छन्हि सेहो जाइत छथि। शेष किनका की मतलब? ई सब तऽ एक अतिरिक्त छुट्टी आ आनन्दक दिन के अतिरिक्त किछु नहि। देश-प्रेम वा कोनो महापुरुषक प्रति प्रेम? ई बस हम सब भाषणे टा मे सुनि सकैत छी। सेहो ओहेन व्यक्तित्वक मुँह सँ जे जिनगी भरि देशक अहित कऽ अपने टा हित केलन्हि।

बात केँ आगू बढ़बैत गजानन बाबू कहलखिन्ह - आय पुनः हिन्दी-प्रेमक नाटक देखू। यत्र-तत्र कार्यक्रमक आयोजन होयत। संस्थागत रूप सँ अतिथि बजाओल जायत। जतऽ सुनब आ पढ़ब अन्य वक्ताक सँगे मुख्य वक्ताक लिखल भाषण मे हिन्दीक प्रति अगाध प्रेमक उद्गार भेटत। हाँ ई अलग बात अछि जे ओहि भाषण मे कतेको अवाँछनीय अंगरेजी शब्द सेहो भेट जाय तऽ आश्चर्यक कुनु बात नहि। सबसँ मजेदार बात ई जे जतेक लोक एहि हिन्दी दिवसक कार्यक्रम मे बढ़ि चढ़िकय भाग लय छथि आ हिन्दीक प्रति अपन अनुराग देखबय छथि हुनकर सभहक सबटा धिया-पुता अंगरेजी विद्यालय मे अनिवार्यरूपेण पढ़य छथि। राष्ट्री स्तर पर हर स्थापित दिवसक प्रति एहि नकली प्रेम-प्रदर्शन सँ गजानन बाबू आय किछु दुखी रहथि आ अन्त मे अपना स्कूलक हिन्दी दिवसक कार्यक्रम मे जिला शिक्षा अधीक्षक केर भाषणक मजेदार संस्मरण सुनौलन्हि। जिला शिक्षा अधीक्षकक हिन्दी दिवस पर बयान छलन्हि जे "आजकल लोगों की बहुत बैड हैबिट हो गई है कि हिन्दी बोलने में भी इन्गलिश वर्ड का यूज करते हैं।" अर्थात् अंगरेजी पर सवार हिन्दी-प्रेम।  

Wednesday, September 5, 2012

विद्यार्थी = जे विद्याक अरथी उठाबय

सब साल जेकाँ एहियो साल शिक्षक दिवस बीत गेल। एकटा आओर अघोषित छुट्टीक दिन शिक्षकगण हेतु। महान शिक्षा-शास्त्री डा० सर्वपल्ली राधाकृष्णन जीक जन्म दिवस आ जिनक जीवन यात्रा एक शिक्षकक के रूप मे शुरू भेल आ देशक सर्वोच्च पद राष्ट्रपति तक पहुँचल। हुनके सम्मान मे ई शिक्षक दिवस प्रतीकात्मक रूप मे मनाओल जाइत अछि। आजादीक संघर्ष सँ निकलल ताहि दिनक शासक-वर्गक स्पष्ट धारणा रहन्हि जे एहेन महापुरुषक जीवन-वृत्त केँ स्मरण केला सँ छात्र समेत आओर लोक केँ प्रेरणा भेटतय। मुदा आजुक स्थिति देखि की हम कहि सकय छी जे की वो पवित्र उद्येश्य पूर्ण भऽ रहल अछि?

गजानन बाबू अपना समय केर एक अभूतपूर्व शिक्षक जे एखन भूतपूर्व भऽ गेल छथि। साँझक समय गामक चौपाल मे एनाय आ हुनका सँ गप्प केनाय सँगहिं गजानन बाबू द्वारा प्रयोजित चाय आ तमाकू खेनाय  गामक लोकक प्रायः नियमित दिनचर्या। गजानन बाबू आन दिनक अपेक्षा आय किछु उदास रहथि। लोक पूछय लागलखिन्ह तऽ बजलाह - की कहू? आजुक शिक्षा व्यवस्था मे भेल पतन सँ मोन कने खिन्न अछि। पहिलुका समय मे शिक्षक खाली किताबेटाक ज्ञान-दान नहि करैत रहथिन्ह बल्कि नैतिक, सामाजिक शिक्षा सँ हुनक सरोकार सेहो रहन्हि। शिक्षक - छात्रक बीच एक अद्भुत आत्मीयताक सम्बन्ध सेहो रहय पिता - पुत्रवत्। छात्र अथवा छात्रक अभिभावक द्वारा विद्यालय आ विद्यालय सँ बाहर सेहो शिक्षकक ओतबे मान-सम्मान सामान्य बात छल। कतेक बेर एहनो देखने छी जे यदि धिया-पुता घर मे बेसी उचृंखल बनय तऽ अभिभावक ई कहि शासन करैत रहथिन्ह जे "चलऽ काल्हि मास्टर साहेब सँ तोहर शिकायत करबौ" आ बच्चा शांत। गामक कुनु भोज-भात मे विद्यालय के सब शिक्षक स्थायी रूपें आमंत्रित रहथि सँगहिं यदि शिक्षक गाम तरफ आबथि तऽ धिया-पुता सँ अभिभावक तक अपन जगह ठाढ़ भऽ हुनका सम्मान दैत रहथिन्ह।

मुदा एखन? गजानन बाबू अपना बात केँ आगाँ बढ़बैत बजलाह - सरकारी आदेश - जे विद्यार्थी केँ मरनाय पीटनाय कानूनी अपराध मानल जायत। यानि डर खतम। सरकारी उपेक्षाक कारणे मासक मास शिक्षकक वेतन बन्द। तेसर बात शिक्षकगणक मुख्य सरकारी कार्य - मनुखक जनगणना, पशुक जनगणना, मकानक गणना, चुनाव करेनाय, स्कूल मे खाना बनबेनाय आदि आदि रहि गेल अछि यानि पढ़ाय छोड़िकय आओर सबकिछु। नीति-श्लोक आ नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम बाहर भऽ गेल आ "सेक्स" पढ़ाबय के बात सरकारी स्तर पर होमय लागल। हे भगवान्! परिणाम?  आय-काल्हि हाले एकदम विचित्र भऽ गेल अछि। एके पानक दोकान पर एक्के समय मे मास्टर साहेब आ विद्यार्थी पान - सिगरेटक सेवन करय छथि। कतेक बेर तऽ इहो सुनय मे आबय अछि जे संगे संग मद्य सेवन सेहो करय छथि। गुरू - शिष्य परम्पराक अन्ते भऽ गेल। परिणाम स्वरूप आब विद्यार्थिये शिक्षक केँ धमकाबय लागल। कनिये टा मत-मतान्तर भेला सँ शिक्षकक विरोध मे स्कूलक गेट बन्द आ नाराबाजी शुरू।

चौपाल मे सब मंत्र-मुग्ध भऽ सुनैत रहथि।  गजानन बाबू पुनः बाजब शुरु केलन्हि - विद्यालय शब्दक अर्थ होइत अछि - विद्या + आलय यानि विद्याक घर आ विद्यार्थी शब्दक अर्थ विद्या + अर्थी यानि विद्याक उपार्जन करनिहार। मुदा आजुक समय मे अर्थ बदलि गेल। आय काल्हि विद्यालय = विद्या + लय यानि जाहिठाम विद्या पूर्णरूपेण लय भऽ जाय अर्थात् मट्टी मे मिल जाय आ विद्यार्थी = विद्या + अरथी अर्थात् जे विद्याक अरथी उठाबय। ठीके आजुक समय मे विद्याक अरथीये ऊठि रहल अछि। गजानन बाबूक विवेचना सँ सब अचंभित भऽ सोचय लऽ मजबूर भऽ गेलाह।