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Monday, July 15, 2013

ई मिथिला के शोक

जाति पाति के नाम पर, खूब चलल अछि राज।
कहिया जागब यौ सुमन, टूटत जखन समाज?

मीठगर बोली सुनिकय, मोन बढ़ल विश्वास।
मिथिला डूबल पानि मे, मेटि सकल नहि प्यास।।

भागि रहल युवजन सुमन, छोड़ि छाड़िकय गाम।
बन्द भेल उद्योग सब, सरकारी परिणाम।।

मिथिला सँ बाहर सुमन, उन्नत मैथिल लोक।
ध्यान हुनक नहि गाम पर, ई मिथिला के शोक।।

मैथिल प्रतिभा के धनी, बिसरि गेल अछि मूल।
देर भेल पहिने बहुत, आब करू नहि भूल।।

Friday, November 16, 2012

लोकक आँखिक पानि


जोश तखन होयत सफल, सुमन हृदय मे होश।
भेटत किछु मदहोश छथि, जागल मे बेहोश।।

के किनका सँ कम एतय, अप्पन बातक मानि।
सूखि रहल अछि नित सुमन, लोकक आँखिक पानि।।

बूढ़ पुरानक बात के, सुमन आय की मोल?
मुँह टेढ़ सुनितहि करत, जेना खेलथि ओल।।

काज सुमन की ज्ञान के, जे बन्धन के मूल?
अहंकार पढ़िकय बढ़य, बूझि लियऽ छी भूल।।

संस्कार छी पैघ केर, छोट करथि सत्कार।
जिनगी बस व्यवहार छी, सुमन बुझल व्यापार।

अपन किबाड़ी बन्द कय, नीक लोक छथि कात।
शेष लोक नित नित सुमन, अपन मनाबथि बात।।

मैथिल मिथिला मैथिली, जागू सकल समाज।
चिन्ता नहि चिन्तन करू, बचत सुमन के लाज।।

Wednesday, October 31, 2012

जागत सकल समाज


उत्साहित युवजन सुमन, ताकि रहल आयाम।
भाव सभक मोनक बनल, विकसित हम्मर गाम।।

चैनपुर छी गाम हमर, जिला सहरसा बीच।
नेता, मंत्री जे सुमन, काज हुनक छल नीच।।

देर, मुदा जागल युवा, भरल मोन मे जोश।
बात खुशी के ई सुमन, बाँचल सभहक होश।।

शुरू करब नहि अछि कठिन, जारी राखब काज।
निश्चित फल भेटत सुमन, जागत सकल समाज।।

आँकब नहि कम बूढ़ केँ, भेटत सब सहयोग।
औषधि छी अनुभव जखन, सुमन भगाबथि रोग।।

Saturday, May 26, 2012

बचल रहय परिवार

बात कहय मे नीक छल, बेटा गेल विदेश।
मुदा सत्य ई बात छी, असगर बहुत कलेश।।

विश्व-ग्राम केर व्यूह मे, टूटि रहल परिवार।
बिसरि गेल धीया-पुता, दादी केर दुलार।।

हेरा गेल अछि भावना, आपस के विश्वास।
भाव बसूला के बनल, भोगि रहल संत्रास।।

शिक्षित केलहुँ कष्ट मे, पूजि पूजि भगवान।
जखन जरूरत भेल तऽ, दूर भेल सन्तान।।

शिक्षित नहि करबय अगर, लोक कहत छी पाप।
मुदा एखन सन्तान लय, मातु-पिता अभिशाप।।

लागय अछि जिनगी एखन, बनल एक अनुबन्ध।
सभहक घर मे देखियौ, टूटि रहल सम्बन्ध।।

बेसी टाका की करब, करियौ सुमन विचार।
सुन्दर एहि सँ बात की, बचल रहय परिवार।।

Saturday, June 25, 2011

होइया कनिको लाज?

खाऽ कऽ जाऊ मचान पर खेलू बैसिकय ताश।
राति अन्हरिया की करत सोलर लेम्प प्रकाश।।

बेटा बेटी सूति गेल की कनिया केर मोल।
मस्त रहू सब छोड़िकय ट्वेन्टी नाइन बोल।।

चारि गोटय नहिये भेटल कियै करय छी रंज।
दूइ गोटय छी संग मे शुरू करू शतरंज।।

बैसलाहा कत्तेक दिना जाऽ कऽ ताकू काज।
भोजन करबा काल मे होइया कनिको लाज।।

काज भेटल हमरा कहाँ जूनि सुमन समझाऊ।
अपना वश केर बात छी आलस रोज भगाऊ।।

Friday, June 24, 2011

देख गाम के यार


पेट भरय लऽ की कहू, कहिया छूटल गाम।
साल बहुत बीतल मुदा,  मोन अछि  ओहि ठाम।

बाहर मे अछि हड़बड़ी, मचल चहुँ दिश शोर।
याद करि नेनपन जखन, भरल आँखि मे नोर।।

आमक गाछी दौड़लहुँ, जखने बहल बसात।
आजुक नवतुरिया बनल, फुसियौंका अभिजात।।

चोर-नुकैया भोर मे, गुल्ली-डण्डा साँझ।
सभहक बेटा सब केर, कियो माय नहि बाँझ।।

कोना बिसरब बात वो, भोगल बाढ़ि सुखार।
सुमन भेल गदगद तखन, देख गाम के यार।।

Monday, June 13, 2011

की अप्पन पहचान?

सभहक सोझाँ प्रश्न अछि, की अप्पन पहचान?
ताकि रहल छी आयधरि, भेटल कहाँ निदान।।

ककरा सँ हम की कहू, सब अपने छथि मस्त।
हाल पुछब झट सँ कहत, हम दुख सँ छी पस्त।।

स्वारथ सभहक देखियो, लागय छथि बेहोश।
फुसिये मुखिया छी बनल, बाते टा मे जोश।।

मुश्किल सँ भेटत कतहु, मैथिल सनक विवाह।
दान सँग मिथिलाङ्ग मे, बहुतो लोक तबाह।।

बरियाती केँ नीक नहि, लागय माछक झोर।
साँझ शुरू भोजन करत, उठता ताबत भोर।।

रसगुल्ला, गुल्ला बनाऽ, खाओत रस निचोड़ि।
खाय सँ बेसी ऐंठ कऽ, देत पात मे छोड़ि।।

मैथिलजन सज्जन बहुत, लोक बहुत विद्वान।
निज-भाषा, निज-लोक पर, दया करू श्रीमान।।

चोरि, छिनरपन छोड़िकय, करू अहाँ सब काज।
मैथिलजन तखने बचब, बाँचत सकल समाज।।

जाति-पाति सब छोड़िकय, बनू एक परिवार।
मिथला के उत्थान हित, करियो सतत विचार।।

अपन लोक तखने जुटत, बाजब मिठका बोल।
टुटल सुमन जौं गाछ सँ, तखन बिकत बेमोल।।