Saturday, January 19, 2013

तऽ फेर की केलहुँ?


बात जौं मोन के नहि केलहुँ, तऽ फेर की केलहुँ?
प्रीत केर दीप नहि जरेलहुँ, तऽ फेर की केलहुँ?

कतेको लोक खसैत भेटत, रोज दुनिया मे
एको टा लोक नहि उठेलहुँ, तऽ फेर की केलहुँ?

लगल छी जोड़ घटावे मे, हम भरि जिनगी   
अपन हिसाब नहि लगेलहुँ, तऽ फेर की केलहुँ?

ज्ञान, धन खूब बढ़ेलहुँ हम गाम सँ बाहर
गाम पर ध्यान नहि लगेलहुँ, तऽ फेर की केलहुँ?

सुनय छै आब कहाँ कियो, सब बाजय छै
सुमन केँ गीत नहि सुनेलहुँ, तऽ फेर की केलहुँ?

Sunday, January 13, 2013

सदरिखन सपना रहय

लोक अप्पन रहय वा कि अदना रहय
हुनक मन  मे, सदरिखन  सपना रहय

लोक बुझय कियै, मोल मरले के बाद
छोड़ि देलक जे, दुनिया वो गहना रहय

पैघ  केँ मान दैत बात खुलिकय करू
मुदा बाजू उचित, जे भी कहना रहय

माय - बापो  तऽ, जीबैत  भगवान छी
नाम  हुनके  जपू, जिनक जपना रहय

हो उचित आचरण, छी सभा मे सुमन
चाहे  बैसी ओतय, वा कि उठना रहय

Friday, November 16, 2012

लोकक आँखिक पानि


जोश तखन होयत सफल, सुमन हृदय मे होश।
भेटत किछु मदहोश छथि, जागल मे बेहोश।।

के किनका सँ कम एतय, अप्पन बातक मानि।
सूखि रहल अछि नित सुमन, लोकक आँखिक पानि।।

बूढ़ पुरानक बात के, सुमन आय की मोल?
मुँह टेढ़ सुनितहि करत, जेना खेलथि ओल।।

काज सुमन की ज्ञान के, जे बन्धन के मूल?
अहंकार पढ़िकय बढ़य, बूझि लियऽ छी भूल।।

संस्कार छी पैघ केर, छोट करथि सत्कार।
जिनगी बस व्यवहार छी, सुमन बुझल व्यापार।

अपन किबाड़ी बन्द कय, नीक लोक छथि कात।
शेष लोक नित नित सुमन, अपन मनाबथि बात।।

मैथिल मिथिला मैथिली, जागू सकल समाज।
चिन्ता नहि चिन्तन करू, बचत सुमन के लाज।।

Tuesday, November 13, 2012

निर्दोष जीवक हत्या - एक विचारणीय प्रश्न


गामक जागरूक आ उत्साही लोकक सहयोग सँ काल्हि चैनपुर मे "गामक विकास लेल मैराथनक" सफल आ ऐतिहासिक आयोजन भेल। आय गाम मे "क्विज" प्रतियोगिताक आयोजन अछि। सचमुच एक नूतन दिशा आ प्रशंसनीय प्रयास। बधाई के पात्र छथि आयोजनकर्ता सब।

आय गाम मे काली पूजाक दोसर दिन छी। आय दुनु काली घर मे करीब १५०० निर्दोष छागर आ पारा केर बलि-प्रदान (हत्या) सेहो होयत शाक्त-पूजाक नाम पर। हम आयधरि एहि धार्मिक नृशंसताक औचित्य नहि बुझि सकलहुँ? बहुत किछु पढ़बाक प्रयास केलहुँ, बहुत विद्वान सँ वार्ता सेहो भेल परन्तु हम संतुष्ट नहि छी एखनहुँ। बहुत विचार केलहुँ धार्मिक-आध्यात्मिक दृष्टिकोणे, मानवीय दृष्टिकोणे, वैज्ञानिक आ इकोलाजिकल बैलेन्सक दृष्टिकोणे - मुदा समाधान नहि भेटल जे एहि तथाकथित "धार्मिक हत्याक" आखिर औचित्य की?

हम नास्तिकता के समर्थक नहि छी। पूजा पाठ खूब करय छी आ विश्वास सेहो राखैत छी। हम जनैत छी जे एहि पोस्ट पर कतेक गोटय के विरोध सेहो हेतेन्ह आ सँगहि सँग कतेक तर्क सेहो भेटत एहि कृत्यक समर्थन मे। हम इहो जनैत छी जे मात्र हमरा किछु लिखने वा कहला सँ ई सैकड़ों सालक परम्परा रुकबो नहि करतय। तथापि आय नहि रोकि सकलहुँ अप्पन एहि अवधारणा केँ पोस्ट करय सँ। सँगहिं सँग ईहो निवेदन जे हम्मर उद्येश्य किनको धार्मिक भावना केँ चोट पहुँचेबाक नहि अछि। 

हम गामक समस्त लोक, विद्वान, प्रबुद्ध-वर्ग सँ विनम्र निवेदन करैत छी जे अप्पन अप्पन विचार एहि विषय पर राखथि जे एहि निर्दोष जीवक बलि-प्रदानक (हत्या) आखिर औचित्य की? एहि बहाना हमरो ज्ञान मे किछु वृ्द्धि भऽ सकैत अछि वा एहि कारणे जन-जागरण सेहो सम्भव अछि। 

Wednesday, October 31, 2012

जागत सकल समाज


उत्साहित युवजन सुमन, ताकि रहल आयाम।
भाव सभक मोनक बनल, विकसित हम्मर गाम।।

चैनपुर छी गाम हमर, जिला सहरसा बीच।
नेता, मंत्री जे सुमन, काज हुनक छल नीच।।

देर, मुदा जागल युवा, भरल मोन मे जोश।
बात खुशी के ई सुमन, बाँचल सभहक होश।।

शुरू करब नहि अछि कठिन, जारी राखब काज।
निश्चित फल भेटत सुमन, जागत सकल समाज।।

आँकब नहि कम बूढ़ केँ, भेटत सब सहयोग।
औषधि छी अनुभव जखन, सुमन भगाबथि रोग।।

Wednesday, October 24, 2012

नीलकंठ बनू


विजया दशमीक दिन। गामक मूर्ति-विसर्जनक पश्चात, गामक लोक सब गजानन बाबूक दरवाजा पर जमा भेलाह। बुझियो जे आन दिनका जेकाँ एक तरह सँ चौपाले लागि गेल। एक ग्रामीणक प्रश्न छल जे आय सम्पूर्ण देश मे विजया दशमीक पर्व अनेकानेक तरीका सँ मनाओल जाऽ रहल अछि। परन्तु अपना सभहक गाम घर मे नीलकंठ पक्षी केँ प्रयास पूर्वक ताकल जाइत अछि पुनि ओकरा उड़ाओल सेहो जाइत अछि कियैक? 

गजानन बाबू बजलाह - देखियो नीलकंठ सँ हमरा सभहक जीवनक बहुत किछु जुड़ल अछि। हमर सभहक पूर्वज बहुत दूरदर्शी छलाह आ प्रतीकात्मक ढंग सँ अपना रिवाज मे बहुतो चीज एहेन जोड़ने रहथि जकर सरोकार आम-जिनगी सँ होइत छल। गाम घर मे आजुक दिन लोक सब नीलकंठ पक्षी केँ देखि अप्पन अप्पन जतरा (यात्रा शब्दक देशज रूप) बनाबय छथि आ नीलकंठक उड़य केर दिशा सँ भरि सालक जतरा केहेन रहत? एकर अनुमान करबाक लौकिक परम्परा सेहो अछि। 

नीलकंठ एक बहुत उपयोगी पक्षी होइत अछि। खेत मे लागल फसल कें नुकसान पहुँचाबयबला जत्तेक कीड़ा, मकोड़ा एत्तेक तक की साँपो, नीलकंठक आहार थीक। आय-काल्हि जे खेत मे कीटनाशकक नाम पर जहर छीटल जाऽ रहल अछि ओकर कोनो जरूरते नहि छैक जौं नीलकंठ पक्षी टा बाँचल रहय। मुदा सुनबा आ देखबा मे आबि रहल अछि जे गिद्ध जेकाँ आय-काल्हि नीलकंठो अलोपित भऽ रहल अछि। देखारे नहि पड़ैत अछि। ई सबटा बेसी फसल आ बेसी दूधक कारणे जे सगरे जहर छीटल जाऽ रहल अछि, ओकरे परिणाम छी। जहिना गिद्ध एक उपयोगी पक्षी अछि, जकरा एक प्राकृतिक "सफाई-कर्मचारी" सेहो कहल जाइत अछि, तहिना नीलकंठ पक्षी सेहो फसल सहित मानवताक लेल बहुत उपयोगी अछि। गिद्धक ऊपर तऽ सरकारक ध्यान गेल आ आब ओकर सरकारी संरक्षण आ अभिवर्धनक उपाय भऽ रहल अछि। मुदा नीलकंठक बारे कोनो चर्चा कतहु नहि अछि? 

प्रायः सब गाम मे अपने सब देखने हेबय जे गामक प्रवेशे-द्वार पर नीलकंठक मंदिर होइत अछि। मानू जे साक्षात नीलकंठ ओहि गामक रखबारी कऽ रहल छथि। ओहिनहियो हमरा "नीलकंठ" शब्द सँ बहुत प्रेम अछि। हमरा, अहाँ केँ वा किनको दिन मे कतेक बेर नीलकंठ बनऽ पड़ैत अछि? कहियो सोचने छिये?

गजानन बाबूक बजबाक क्रम जारी छल - समुन्द्र मंथनक पश्चात् जखन कालकूट जहर निकलल तखन देवगण चिन्तित भेलाह जे आब एहि जहरक कोन उपाय हेतय? बाहर फेंकने सँ संसारक  नाश भेनाय निश्चित छैक। विस्तार मे नहि जाय छी कियैक तऽ ई खिस्सा सब गोटय जनिते होयब। भगवान शंकर तैयार भेलाह आ अपना कंठ मे ओहि कालकूट जहर केँ योगबल सँ स्थान देलखिन्ह जाहि कारणे हुनक कंठ नीला भऽ गेल आ हुनक नाम ताहि दिन सँ नीलकंठ भऽ गेल। जहरक ताप कम करबाक लेल हुनका जटा मे गंगा, माथा पर चन्द्रमा आ गरदैन मे साँप (सब शीतलताक प्रतीक) आबि गेल।

गजानन बाबू पुनि बजलाह -आब अपना अपना जिनगी मे सब सब कियो ईमानदारी सँ सोचय जाऊ जे परिवार होय वा समाज, आफिस होय वा बाजार - हमरा सब केँ कत्तेक बेर ओहेन काज विवशता मे करऽ पड़ैत अछि जे हम सचमुच हृदय सँ नहि करऽ चाहैत छी। मात्र परिवारक, समाजक, नौकरीक, व्यापारक रक्षा लेल। दोसर शब्द मे कही तऽ जहर पीबऽ पड़ैत अछि। कहू फुसियो कहय छी? आब सब कियो अपना मोने मोन सोचियो जे हमहुँ सब रोजे नीलकंठ बनय छी कि नहि? जाबत नीलकंठ नहि बाँचत आ जाबत हमसब नीलकंठ नहि बनब ताबत जिनगीक जतरा कोना बनत यौ? ताहि हेतु नीलकंठ बनय जाऊ। कोनो पारम्परिक बात केँ जीवन सँ जोड़ि देनाय ई गजानन बाबूक विद्वता आ तर्क-शक्तिक कमाल थीक जाहि सँ सब ग्रमीण प्रायः परिचिते छथि।

Saturday, October 13, 2012

हम पान आ प्राण संगहिं छोड़ब।

दिन राति जतऽ देखू ततऽ जाने अनजाने प्रायः सब कियो अप्पन अप्पन विशिष्टता (अहंकार सेहो कहि सकय छी) स्थपित करय मे लागल रहय छथि। बस अवसर भेटबाक चाही। एक महिला मित्र (या मित्राणी जे कही) सँ बातचीत होइत छल। अप्पन विशिष्टताक बोध करबैत बजलीह - हम एहि कारणे अमुक संस्था छोड़ि देलहुँ, अमुक कारणे अमुक संगठन। हमरा कनियो टा अनर्गल बात बर्दाश्त नहि होइत अछि आदि आदि ---। कने देरक बाद पुनः शुरू भेलीह हम चाय छोड़ि देलहुँ, हमरा आब भोजनो सँ ओतेक अनुराग नहि। यानि जेहेन प्रसंग आ परिवेश तेहने अप्पन विशिष्टता पर हुनक वक्तव्य। हमहुँ कतेक सुनितहुँ? एकाएक मुँह सँ निकलल - मित्र अहाँ बिल्कुल ठीक कऽ रहल छी। भने धीरे धीरे सब किछु छोड़य केर आदत बना रहल छी। एक दिन तऽ ई देह आ दुनिया सेहो छूड़ैये पड़त ने। नीक अछि छोड़बाक पूर्वाभ्यास भऽ रहल अछि। हमर महिला मित्र लजाऽ गेलीह।

जीवन जीयब एक धर्म छी। आ धर्म की? विद्वान लोकक मुँह सँ सुनने छी जे "यः धारयति स धर्मः"। अर्थात् धर्म धारण करबाक नाम थीक, नहि की छोड़य वा पलायन केर। जिनगी सँ हम सब कियो रोजे रोज टकराबय छी तखन "जीवन-धर्मक" पालन सम्भव भऽ रहल अछि आ हम सब अपना अपना ढंगे जीबि रहल छी। बहुतो बेर इहो सुनने छी चौरासी लाख योनि भ्रमणक पश्चात मानव जीवन भेटैत अछि। आब अहीं सब कहय जाऊ जे एतेक कठिन सँ मानव-जीवन भेटल तखनहुँ यदि जीवन-धर्मक पालन नहि केलहुँ तऽ की केलहुँ?

प्रायः हम सब कम सँ कम एक पत्नी सहित धिया-पुता, भाय-बहिन, माता-पिताक सँगे एक्के घर मे रहय छी। कम या बेसी आपस मे खटपट होइते रहय छैक। तऽ की हम अप्पन परिजन केँ छोड़ि दैत छी? बहुमतक जवाब भेटत नहि। मुदा जे छोड़ि दैत छथि हुनका समाज मे नीक स्थान कहियो भेटय छै की? बिल्कुल नहि। भबिष्यो मे एहने स्थिति शाश्वत काल तक रहत, ई हम सब उम्मीद कऽ सकैत छी। कारण समाज शास्त्रक हिसाबें मनुक्ख केँ एक सामाजिक जानवर कहल गेल अछि। अप्पन गज़लक ई पाँति याद आबि गेल -

भेट जाय भगवान किंचित्, की भेटत इन्सान यौ
मुँह सँ जे लोक अप्पन, मोन सँ बेईमान यौ

ईमानदारीपूर्वक कहऽ चाहैत छी जे खूब विचार केलाक बाद हम अपना बारे मे कहि सकैत छी जे आयधरि हमहुँ "इन्सान" नहि भऽ सकलहुँ। बस पैघ लोकक बनाओल रस्ता पर चलबाक प्रयास भरि कऽ रहल छी। मोन मे अछि यथासम्भव "जीवन-धर्मक" निर्वाह करी। ताहि हेतु कोनो चीज छोड़य सँ बेसी धारण करवाक प्रवृत्ति अछि।

हम खूब मोन सँ पान खाय छी। जीवनक शुरुआती दिन कहियो पानक डाली मे सुपारी नहि तऽ कहियो पानक पात मुरझायल। दिक्कत होमय लागल तऽ प्रयास कऽ सुमन जी (पत्नी) केँ पान खेनाय सिखेलहुँ। आब हमरा सँ बेसी हुनके बेगरता रहैत छन्हि। हमर दिक्कत खतम। किछु दिन पूर्व एहि "पान-प्रेमक" प्रभाव सँ दाँतक डाक्टर लग जाऽ पड़ल। डाक्टर साहेब सलाह देलथि जे अहाँ पान छोड़ि दियऽ। हमरा मुँह पर मुस्कान देखि डाक्टर साहेब पुनि बाजि उठलाह हँसलहुँ कियैक? हम बजलहुँ - डाक्टरक सलाह तऽ मानब हमर मजबूरी अछि ने? नहि तऽ ----। डाक्टर साहेब बजलाह - नहि तऽ की विचार अछि? हम बजलहुँ - यदि हम्मर विचारक बात होय तऽ हम पान आ प्राण एक्के सँग छोड़ब। डाक्टर साहेब हँसय लगलाह।