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Wednesday, July 4, 2012

कनी टा सोचियो मन मे

यौ किनका  की कखन कहबय, कनी टा सोचियो मन मे
कोना  शमशान  मे  हँसबय,  कनी  टा  सोचियो  मन  मे

कहब आभार  भेल  भारी, ग्रहण  अछि  मुँह पर लागल
कि हँसिकय दुख प्रगट करबय, कनी टा सोचियो मन मे

स्वजन  दुख मे अगर कानय, तखन की मोल सम्पति के
कि  टाका  सँग  अहाँ  जरबय, कनी  टा सोचियो मन मे

एखन  सम्बन्ध   परिवारक,  जेहेन  अखबार  हो  बासी
एहेन  दुनिया  मे रहि  सकबय, कनी टा सोचियो मन मे

जीयब जौं  संस्कारक सँग, तखन जिनगी सुमन-जीवन
ओना बढ़ियो केँ नित खसबय, कनी टा सोचियो मन मे

Wednesday, May 23, 2012

रंग श्यामल-रंग मे

गीत  लिखलहुँ  आय - धरि  जे,  भावना  के  संग मे
ताहि  कारण  अछि  सुमन  के, रंग  श्यामल - रंग मे

भोगि चुकलहुँ जे एखनधरि, गीत-कविता मे लिखल
किछु समाजक  व्यंग्य - दोहा, किछु गजल के ढंग मे

नेनपन  केर तीत - मीठक, याद आबय अछि एखन
सुखक साधन सब अरजलहुँ, पर फँसल छी जंग मे

राति-दिन सोचय छी कहुना हो सफल जीवन अपन
ज्ञान - अर्जन  सँग   उठेलहुँ,  डेग   सबटा  उमंग  मे

सोचलहुँ  जेहेन  तेहेन, परिणाम  हमरा नहि भेटल
हार  मानब  नहि  पुनः,  कोशिश  करब  नवरंग मे

Friday, May 18, 2012

हाथ पकड़लहुँ जखन सुमन के


मन सुरभित छल आस मिलन के, प्यास नयन मे तृषित नयन के
बाजल हिरदय धक धक धक धक, सुनितहिं धुन पायल छन छन के

दशा पूर्व के पहिल मिलन सँ, कहब कठिन ई सब जानय छी
साल एक, पल एक लगय छल, बढ़ल कुतुहल छन छन मन के

कोना बात शुरू करबय हम, कतेक बेर मन सोचि चुकल छल
भेटल छल हमरा नहि तखनहुँ, समाधान की, एहि उलझन के

बाहर हँसी ठहाका सभहक, सुनैत छलहुँ बस हम कोहबर सँ
चित चंचल मुदा सोचलहुँ बाँचल, चारि दिना एखनहुँ बन्धन के

धीर धरू अपने सँ कहिकय, कहुना अप्पन मोन बुझेलहुँ
वाक-हरण बस आँखि बजय छल, हाथ पकड़लहुँ जखन सुमन के





Tuesday, May 8, 2012

सुमन लिखत श्रृंगारक कविता

मीठगर बोली हम जनय छी
तैयो तीतगर बात करय छी

जौं साहित्य समाजक दर्पण
पाँती मे दर्पण देखबय छी

मिथिला के गुणगान बहुत भेल
जे आजुक हालात, लिखय
छी

भजन बहुत मिथिला मे लिखल
अछि पाथर, भगवान देखय छी

रोटी पहिने या सुन्दरता
सभहक सोझाँ प्रश्न रखय छी

भूख, अशिक्षा, बेकारी सँग
साल साल हम बाढ़ि भोगय छी

सुमन लिखत श्रृंगारक कविता
पहिने सूतल
केँ जगबय छी

Monday, May 7, 2012

कुक्कुर केँ सन्तान बनाबी

व्यर्थ कियै दालान बनाबी
घर केँ तोड़ि मकान बनाबी

टाका अछि तऽ आदर भेटत
द्वारो पर दोकान बनाबी

आगाँ पाछाँ लोक घूमत जौं
सज्जन केँ नादान बनाबी

बच्चा सब केँ हास्टल भेजू
कुक्कुर केँ सन्तान बनाबी

जीवन देलक आस लगाऽ जे
मातु पिता निम्झान बनाबी

सबटा सुख हमरे लग आबय
एहेन कियै अरमान बनाबी

हमहुँ जीबी लोकक संग मे
दुनिया सुमन महान बनाबी

Sunday, May 6, 2012

अपने घर मेहमान यौ

भेट जाय भगवान किंचित्, की भेटत इन्सान यौ 
मुँह सँ  जे  लोक  अप्पन, मोन  सँ  बेईमान यौ

एक दोसर बात पर, विश्वास, कोना, के करत
छोड़ि  दियऽ  बात आनक, प्रश्न  मे  सन्तान यौ

बल जाबत छल, कमेलहुँ, धन अरजलहुँ पुत्र लय
आय छी बनिकय उपेक्षित, अपने घर मेहमान यौ

काज आजुक जेहेन हम्मर, भाग्य निर्धारित तेहेन
सूत्र जीवन के बिसरिकय, कोन ठाँ अछि ध्यान यौ

नीति जेहेन, तेहने नीयत, वो नियति केर मूल छी 
हमहुँ जीबि, लोक जीबय, ई सुमन अरमान यौ

Saturday, May 5, 2012

पुनि ताकू अछि राम हेरायल

कतय पुरनका  गाम हेरायल
किंचित् हमरो नाम हेरायल

प्रेम-सहज, सद्भाव, समर्पण
सचमुच ई परिणाम हेरायल

बुधियरका सब गेल 
शहर मे
हुनको छन्हि आराम हेरायल

शहर सँ टाका
, गामक खेती
सब छूटल,
अंजाम हेरायल

सुख-दुख मे जे छल सहयोगी
हृदय-भाव, सत्काम हेरायल

मान करय छल छोट, पैघ के
लागय एखन लगाम हेरायल

सुमन सहोदर भाग्य सँ
भेटल
पुनि ताकू अछि राम हेरायल

Friday, May 4, 2012

मैथिल मिथिला नाज हमर

भेद भाव बिनु सबकय जोड़ू, बाँचत तखन समाज हमर
सबकियो मिलिकय बाजू सगरे, चाही मिथिला राज हमर

राज बहुत पहिने सँ मिथिला, छिना गेल अछि साजिश मे
जाबत ओ सम्मान भेटत नहि, बाँचत कोना लाज हमर

विविध विषय के ज्ञानी मैथिल, दुनिया मे भेटत सगरे 
मुँह बन्द
राखब कहिया तक, के सुनतय आवाज हमर

आजादी के बादो सब दिन, भेल उपेक्षा सरकारी
बहल विकासक गंगा 
सगरे, बाँचल खाली काज हमर

सज्जनता श्रृंगार सुमन छी, दिल्ली बुझलक कमजोरी
जागू मिथिलावासी आबो, मैथिल मिथिला नाज हमर

Thursday, May 3, 2012

हँसी मुँह पर साटय छी


धीया-पुता दुख नहि बूझय, हँसी मुँह पर साटय छी
खरचा एक पुराबय खातिर, दोसर खरचा काटय छी

आजुक युग मे कम्प्यूटर बिनु, नवतुरिया सब की पढ़तय
मुदा माँग पर, टाका नहि तेँ, बच्चा सब केँ डाँटय छी

बनल बसूला सम्बन्धी-जन, बाजय मीठगर बोली यौ
दुख मे रहितहुँ पर विवेक सँ, सभहक हिस्सा बाँटय छी

अपन हृदय मे भाव जेहेन छल, बुझलहुँ छै तेहने दुनिया
चीन्हा गेल अछि अप्पन-अदना, हुनके सबकेँ छाँटय छी

सुमन संगिनी जीवन भेटल, रूप मनोहर काया संग
दुख भीजल तऽ चोकर आमक, रूप देखिकय फाटय छी

Wednesday, May 2, 2012

ई खटहा अंगूर छी

किछु कुबेर के चक्रव्यूह मे, कानूनन मजबूर छी
रही कृषक आ खेत छिनाओल, तहिये सँ मजदूर छी

छलय घर मे जमघट हरदम, हित नाता सम्बन्धी के

कतऽ अबय छथि आब एखन ओ, प्रायः सब सँ दूर छी

काज करय छी राति दिना हम, तैयो मोन उदास हमर

साहस दैत बुझाओल कनिया, अहाँ हमर सिन्दूर छी

एहेन व्यवस्था हो परिवर्तित, लोकक सँग आवाज दियौ

एखनहुँ आगि बचल अछि भीतर, झाँपल तोपल घूर छी

बलिदानी संकल्प सुमन के, कहुना दुनिया बाँचि सकय 

नहि बाजब नढ़िया केर भाषा, ई खटहा अंगूर छी

Monday, April 30, 2012

संस्कार सन्तान मे


स्वजन मृत्यु पर कानैत बाजैत, गेल छलहुँ शमशान मे
आनल जायब एहिना हमहुँ, आयल अचानक ध्यान मे

बाजी सब कियो राम नाम संग, सभहक गाति एहने होइछै
बाहर आबिते फूसि फटक्कर, केलहुँ शुरू दलान मे

बात सदरिखन की लऽ एलहुँ, की लऽ जायब दुनिया सँ
मुदा सहोदर सँ झगड़ा नित, होई छै नहि अन्जान मे

भाग्य लिखल जे हेबे करतय, काज करय के काज की
चिकरि चिकरि केँ बाजू एतबे, दास मलूक सम्मान मे

सुमन मनुक्खक जीवन भेटल, घटना छी अनमोल यौ
सफल तखन पल पल जीवन के, संस्कार सन्तान मे

Tuesday, April 17, 2012

रहबय कोहबर कत्तेक दिन

रहबय कोहबर कत्तेक दिन
बनिकय अजगर कत्तेक दिन

शादी तऽ एक संस्कार छी
जीबय असगर कत्तेक दिन

बिना काज के मान घटत नित
फूसिये दीदगर कत्तेक दिन

बैसल देहक काज कोन छै
एहने मोटगर कत्तेक दिन

आबहुँ जागू सुमन आलसी
खेबय नोनगर कत्तेक दिन

Monday, April 16, 2012

गलती बारम्बार करू

गलती बारम्बार करू
अधलाहा सँ प्यार करू

दुर्गुण सँ के दूर जगत मे
निज-दुर्गुण स्वीकार करू

दाम समय के सब सँ बेसी
सदिखन किछु व्यापार करू

अपने नीचा, मोन पालकी
एहि पर कने विचार करू

बल भेटत स्थायी, पढ़िकय
ज्ञानो पर अधिकार करू

भाग्य बनत कर्मे टा फल सँ
आलस केँ धिक्कार करू

प्रेमक बाहर किछु नहि भेटत
प्रीति सुमन-श्रृंगार करू

Saturday, April 14, 2012

चलू बैसिकय सब कानय छी

रीति  बिगड़ि  गेल  जानय  छी
चलू  बैसिकय  सब  कानय छी

जौं  असगरुवा  कम लागय तऽ
आओर   लोक  केँ  आनय  छी

हमहीं कारण हर सुख - दुख के 
असल  सत्य  ई  के  मानय  छी

बूढ़ - बुजुर्गक  कहल  बात  केँ
यौ  के  के  एखन  गुदानय  छी

पहिने  कोशिश   तखने  आशा 
फुसिये  गप्प  कियै  तानय  छी

नीक आओर अधलाह लोक केँ
कियैक  एक्के   सँग  सानय छी

चालनि  लऽ कऽ सुमन हाथ मे
जे  नीक  लोक  केँ  छानय छी

Monday, April 9, 2012

मोन कियै सिंहासन पर

मोन कियै सिंहासन पर
घर मे आफत राशन पर

काज करय मे दाँती लागय
तामस झाड़ी बासन पर

लाज करू जे पाहुन जेकाँ
खाय छी कोना आसन पर

खोज-खबर नहि धिया-पुता के
बात सुनाबी शासन पर

बिना कमेने किछु नहि भेटत
जीयब खाली भाषण पर

कहू सोचिकय कहिया सुधरब
जखन उमरि निर्वासन पर

सुमन समय पर काज करू
आ सोचू निज अनुशासन पर

Thursday, March 29, 2012

तखने जीयब शान सँ

समय के सँग मे डेग बढ़ाबी, तखने जीयब शान सँ
किछु ऊपर सँ रोज कमाबी, तखने जीयब शान सँ

काका, काकी, पिसा, पिसी, रिश्ता भेल पुरान यौ
कहुना हुनका दूर भगाबी, तखने जीयब शान सँ

सठिया गेला बूढ़ लोक सब, 
हुनका बातक मोल की
हुनको नवका पाठ पढ़ाबी, तखने जीयब शान सँ

सासुर अप्पन, कनिया, बच्चा, एतबे टा पर ध्यान दियऽ
बाकी सब सँ पिण्ड छोड़ाबी, तखने जीयब शान सँ

मातु-पिता केर
 चश्मा टूटल, कपड़ा छय सेहो फाटल
कनिया लय नित सोन गढ़ाबी, तखने जीयब शान सँ

पिछड़ल लोक बसय
मिथिला मे, धिया-पुता सँ कहियो
अंगरेजी मे रीति सिखाबी, तखने जीयब शान सँ

सुमन दहेजक निन्दा करियो, बस बेटी
क वियाह मे
बेटा बेर मे खूब गनाबी, तखने जीयब शान सँ

Wednesday, March 28, 2012

कियै कानय छी

भेटेय छै फल अपन कर्मक जखन मानय छी
फुटल नसीब तखन कहिकय कियै कानय छी

खेलहुँ नय नीक-निकुत कहियो ककर दोष कहू
खाय छी कूटि केँ ओतबे नित लूटि आनय छी

रहल छी साल कतेक संगे आबो चीन्ह लियऽ
बुझिकय खाट कियै हमरा नित गतानय छी

लोक मे पानि भऽ रहल कम आओर दुनिया मे
आँखि के नोर सँ नित आटा हमहुँ सानय छी

लगल छी रोज प्रशंसा मे जिनका टाका छै
हुनक खराब छलय नीयत जखन जानय छी

बूढ़ केँ ज्ञान बिसरि कहलहुँ बोझ भऽ गेला
मोन सँ सोचि कहू हुनका के गुदानय छी

टूटल प्रतिज्ञा सुमन जखने तखन हूब घटल
करू प्रयास खूब मन सँ किछुओ ठानय छी

Tuesday, March 27, 2012

जतबय अछि औकात करय छी

कत्तेक सुन्दर बात करय छी
पाछाँ सँ आघात करय छी

जखनहि स्वार्थ सधल जिनका सँ
तखनहि हुनका कात करय छी

सगरे देख रहल छी प्रायः
झगड़ा हम बेबात करय छी

टाका सबटा गेल दहेजे
डीह बेचि बरियात करय छी

कनिको दुख नहि सुमन हृदय मे
जतबय
अछि औकात करय छी

Monday, March 26, 2012

खूब मोन सँ सभक सुनय छी

कनिये कनिये रोज लिखय छी
छात्र एखन, साहित्य सिखय छी

भारी भरकम बात लिखल नहि
घर-आँगन केर बात कहय छी

बेसी वक्ता, कम श्रोता
अछि
कविता सँ सम्वाद करय छी

कहियो नहि मन-दर्पण देखल
बाहर दर्पण रोज देखय छी

छी असगर ई भाव भीड़ मे
बनिकऽ पानी संग बहय छी

एहि जीवन मे दुख ककरा नहि
दुख मे नित मजबूत रहय छी

कियो सुमन के सत्य सुनल नहि
खूब मोन सँ सभक सुनय छी

Sunday, March 25, 2012

लागल एहेन रिवाज बिसरलहुँ

अप्पन अप्पन काज बिसरलहुँ
सच पूछू तऽ लाज बिसरलहुँ

सिखलहुँ लूरि जीबय के जतय
कियै ओहेन समाज बिसरलहुँ

छूटल अरिपन, सोहर सब किछु
लागल एहेन रिवाज बिसरलहुँ

सासुर मे छल खूब रईसी
घर मे नखरा-नाज बिसरलहुँ

मन गाबय छल गीत मिलन के
सुर के सँग मे साज बिसरलहुँ

संस्कार के बात करी नित
जीबय के अन्दाज बिसरलहुँ

चुप रहलहुँ अन्याय देखिकय
सुमन हृदय आवाज बिसरलहुँ