Wednesday, February 26, 2025

भगवानक भगवान

महादेव! भगवानक भगवान। 
मृत्यु - भुवन सँ देवलोक तक, सभक करथि कल्याण।।
महादेव! भगवानक भगवान। 

कखनो छथि कैलाश बसल वो, कखनो जाऽ शमशान। 
कत्तऊ  रहथि पर  राखथि हरदम, दुखियारी के ध्यान।।
महादेव! भगवानक भगवान।

दुनिया  केर  कल्याणक  खातिर, कालकूट - विष पान। 
ताप  शमन  लय  साँप  गला  मे, गंगा सिर  पर  चान।।
महादेव! भगवानक भगवान।।

पूजा - पाठ   सहज  शंकर  केर,  बेसी  कहाँ  विधान।?
चरण मे अर्पित  नोर  सुमन सँग , दियऽ शरण स्थान।।
महादेव! भगवानक भगवान।

सुमन व्यर्थ मे माथ धुनय छी

अपना दुख लय  सब कनय छी,
किनकर के  के  बात सुनय छी?

जिनका  जेहेन  सुविधा  भेटल,
राह  अपन  ओहने  चुनय  छी।

अपना सुखलय लोकक सुख केँ,
चाल चलिकय रोज छीनय छी।

गलत लोक चुनबय तऽ बुझियौ
दुख  अप्पन  अपने  कीनय छी।।

जीबैत  लोक  बनय  मुर्दा  -सन,
गलती पर जौं आँखि मुनय छी।।

तखने  टा   संघर्ष   सफल  जौं,
अपन  स्वप्न  केँ  रोज बुनय छी।।

नहि सुनलक नहि सुनता कियो,
सुमन  व्यर्थ  मे  माथ धुनय छी।।

Tuesday, February 25, 2025

हमजोली फागुन मे

ऋतु - राज  वसंत  एलय, छै  होली फागुन मे
कोयल  के  तान  मधुर, आ  बोली  फागुन मे 

नहि ठण्ढ  बहुत  बेसी, नहि  गरमी  के चिन्ता
सब  ताकि  रहल अप्पन, हमजोली  फागुन मे 

सुख-दुख सँ बाहर के, अछि दर्द सभक अप्पन 
वो पोटरी  सुख - दुख के, हम खोली फागुन मे 

धरती असमान रंगल, निज फगुआ दिन सगरो
सब  हाथ  मे  रंगक  छै, एक  झोली फागुन मे

किछु नशा छै मौसम के, किछु रंग - अबीरो के 
कियो ताकय  झट भेटय, भंग-गोली फागुन मे

हम ढोल - मजीरा सँग, घूमय छी नगर - डगर 
हर  शहर  मे मैथिल केर, एक टोली फागुन मे

अछि बाँचल कनियो टा, कनिये टा भाँग दियऽ 
अछि सुनना सुमन के जौं, बकलोली फागुन मे

रोकि दियौ यमराज केँ

जे फगुआ दिन रहय उदास, 
हुनका बुझियौ विपदा खास, 
मिलिकय खुशी मनाबथि हुनकर, रोकू नहि आवाज केँ।
एक  दिन फगुआ लय भगवन्, रोकि  दियौ यमराज केँ।।

सुख - दुख अहिना  एतय जेतय, खुशी मनाबी होली मे।
ढोल - मजीरा के   सँग घूमय, घर - घर जायब टोली मे।
हँसी - ठिठोली खूब करू पर, बचाकय रखियौ लाज केँ। 
एक दिन फगुआ -----

हरियर, पीयर, लाल रंग सँ, फागुन केर नव - रंग बनय। 
सब झंझट फगुआ दिन छोड़ू, साजन-सजनी सँग बनय।
फगुआ खातिर छोड़ि सकय छी, दुनियाभरि के राज केँ।।
एक दिन फगुआ -----

ठंढ - गरम समतूल  हवा मे, पुष्प सुगंधित गमकि रहल।
देहक रंग भले श्यामल अछि, सुमन-सँग में चमकि रहल।
प्रेमक  रंग चढ़ल  फागुन मे, छोड़ि - छाड़ि सब काज केँ।।
एक दिन फगुआ -----

Saturday, February 22, 2025

घून लगत परिवार मे

मोल सभक नित बढ़तय घटतय,
दूर  भेल   से  आबिकय सटतय,
एक   धर्म  मानवता  सभहक, जीबय  लय  संसार  मे।
मुदा  एखन  पाखण्डी  लोकक, चलती  छै  व्यवहार मे।।

पहिल तीर्थ परिवार हमर छी, जहिठां सभहक आदर हो।
जत्तेक  सम्भव   बूढ़ - पुरानक,  इच्छा   पूरित सादर हो।
बूढ़  लोक  जौं   दुखी   रहत  तऽ, घून लगत परिवार मे।।
मुदा एखन -----

गलती सब सँ हेबे करतय, बुझाऽ - सुझाऽ के माफ करू।
नेना - भुटका  के  भविष्य लय, रस्ता अगिला साफ करू।
सजग - लोक   केँ  भेटय  हरदम,  मजबूती  आधार   मे।।
मुदा एखन -----

धर्म - कर्म सँ जुड़ल रहू पर, जग-जीवन केर ध्यान रहय। 
अप्पन  भाषा, जन्मभूमि  केर, सुमन - हृदय स्थान रहय। 
तखने  टा  सहभागी  बनबय,  जीवन  केर   विस्तार  मे।।
मुदा एखन ----

इज्जत लोक बचायत कोना?

लोक भेटल सगरो बिचकाठी, 
बात सँ चलबय बातक लाठी, 
चालि - चलन  सामूहिक  बदलल, सामाजिक आधार में। 
इज्जत  लोक  बचायत  कोना, एहि  बिगड़ल  संसार  में।।

नेनपन सँ अछि  दोस्त  गरीबी, दूर भेल  जे लोक करीबी। 
लोक-चेतना जगबय खातिर, छूटल कहिया हमर फकीरी?
कहियो काल खुशी मन हम्मर, लिखल छपय अखबार में।
इज्जत लोक -----

मातु-पिता केर अछि मजबूरी, धिया-पुता सँ बढ़लय दूरी।
भटकि रहल वो देश- विदेशो, उचित कहाँ भेटय मजदूरी?
मानव - मूल्य  हेरायल  कत्तय,  सुविधा  केर  व्यापार मे??
इज्जत लोक -----

नीक नौकरी सभक सेहन्ता, बच्चा हो अफसर, अभियंता।
संस्कार अप्पन छूटल  तऽ, नीक सुमन कोना क्यो बनता?
अपन आचरण  केवल  वश मे, किछुओ नहि अधिकार मे।।
इज्जत लोक -----

बस हम छी निर्दोष

हम्मर  गलती  अछि  कहाँ, सब दोसर के दोष।
सब  लागल  साबित करी, बस हम छी निर्दोष।।

आपस  के  व्यवहार  मे, आवश्यक अछि लोच। 
सम्भव  तखने  लोक भी, बुझत  अहाँ के सोच।।

अक्सर  सुनबय  लोक सँ, दुनिया बहुत खराब। 
अपन  बुराई छोड़िकय, राखथि सभक हिसाब।।

लेखन  मे  हम  सब करी, मिथिला के गुणगान।
मिथिला  डूबय  बाढ़ि  मे, साल - साल श्रीमान।।

सत्य   सोझ  मे  ठाढ़ जे, करू ओहि  पर बात। 
सामाजिक सहयोग पर, नहि किनको अवघात।।

छी  मिथिला  सँ  दूर  हम, भोगी नित्य वियोग।
मुदा भाव अछि कऽ सकी, सामाजिक सहयोग।।

प्रायोजित  सम्मान  केँ, बूझथि  जे  निज-भाग।
गाबि  रहल  छथि वो सुमन, नित दरबारी-राग।।