Sunday, August 21, 2022

आय सीता केर उपेक्षा

आपसी  सहयोग  केर  गप, हम करय छी राति दिन
पानि  तेलक  मेल  एहेन,  सँग  रहय  छी  राति दिन

सँग   सीता  केर  भेटल  तऽ,  राम  पूजित  विश्व  मे
आय  सीता  केर  उपेक्षा, हम  देखय  छी  राति दिन

मीठ - बोली, ज्ञान - अर्जन, अछि  हमर  पहचान यौ
वो छुटल बस ताहि कारण, दुख सहय छी राति दिन

ज्ञान  केर  सम्मान  तखने, लोक - हित  मे  काज हो
लोक बड़का बनिकय स्वारथ, मे बहय छी राति दिन

आचरण  कारण  सुमन  जे, याद  किनको  हम करी
दोष निज के आँखि अप्पन, झट मुनय छी राति दिन

पोखरि सहित ईनार निपत्ता

प्रेम-पूर्ण व्यवहार निपत्ता
सहयोगी परिवार निपत्ता

गप्पक खेती बड़ उपजाऊ
जीबय के आधार निपत्ता

आपस मे झगड़ा के कारण
भेल सभक अधिकार निपत्ता

गली-सड़क तक दाबि लेने छी
पोखरि सहित ईनार निपत्ता

लोक समाजिक कतऽ हेरायल
बचपन के सब यार निपत्ता

घर सँ बाहर बच्चा सभहक
पढ़यबला दुआर निपत्ता

सुमन चेतना-दीप जराबय
रोकू, भेल विचार निपत्ता

Thursday, August 18, 2022

घर-घर लोक जगायब हम

सूखल  धरती  मे कोशिश  कऽ, जल केर स्रोत बहायब हम
अहाँ  अन्हरिया  जतेक  बढ़ेबय, ओतबे  दीप  जरायब हम

रूप  मनुक्खक  हम्मर सभहक, पशुता छूटल नहि एखनहुँ 
वो  पशुता  कम  हेतय  कोना, घर - घर लोक जगायब हम

सब कोदारि बनि जमा करय छी, अप्पन स्वारथ केर माटी
खुरपी  बनिकय आस पास केर, स्वारथ  केँ सहलायब हम

असगर  खुशी अगर  कतबो छी, दुई कौड़ी के मोल ओकर
कृष्ण कन्हाई नहि छी तैयो, किछु किछु खुशी लुटायब हम

शास्त्र  मे वर्णित अपन काज सँ, लोक, देवता बनय सुमन
मृत्यु - काल तक  नेक कर्म सँ, जीवन सफल बनायब हम

जय जय सीताराम कहू

भेल अचानक तालाबंदी,
जय जय सीताराम कहू
काजो पर लागल पाबंदी,
जय जय सीताराम कहू

          बिना काज के बढ़ल गरीबी,
          घर घर मे झगड़ा बढ़लय
          सामाजिक मूल्यक नसबंदी,
          जय जय सीताराम कहू

नहि आयल कालाधन कोनो,
नहि कत्तऊ आतंक रुकल
तखन कियैक भेलय नोटबंदी,
जय जय सीताराम कहू

          हिनकर शासन, हुनकर शासन,
          सब कियो लुटलक लोके केँ 
          गद्दी खातिर जुगलबंदी,
          जय जय सीताराम कहू

सत्ता के गुणगान छोड़िकय,
सुमन पूछियौ प्रश्न अपन
तोड़ू अप्पन मोनक बंदी,
जय जय सीताराम कहू

आबिकय रोज हम जगाबय छी

किछ पाँति लिखय छी काटय छी
गीत  जिनगीक  रोज  गाबय  छी

खेल  नेनपन  मे जे सीखौने छल
आब  हुनके  एखन खेलाबय छी

भीड़ तऽ लोक केर भेटल सगरो 
ओहि मे लोक अपन  ताकय छी

ज्ञान एत्तऽ कहू छै कम किनका
तैयो  जबरन  हमहुँ सुनाबय छी

नीच  कर्मों  सँ जे धनिक भेलाऽ
हुनके  जयकार हम लगाबय छी

मेल  आपस  के  गेल  खटाई मे
तैयो नित हम कलह बढ़ाबय छी

आब  कत्तेक  दिना सुमन सूतब
आबिकय  रोज हम जगाबय छी

अप्पन अप्पन गाम जगाबू

रहू कतहु आ कतहु कमाबू।
अप्पन अप्पन गाम जगाबू।।

पढ़ल - लिखल  सब  बाहर गेल।
सचमुच   गाम    पिछड़िये   गेल।
अक्सर    बोली    सुनबय    टेढ़।
काज   बिना   बस   गप्पक  ढेर।
अनुशासन   केर   घोर   अभाव।
टेढ़ - बोलिया केर बढ़ल प्रभाव।
कोशिश   करू,  विराम  लगाबू।
अप्पन अप्पन -----

मरनी  -  हरनी,  व्याहक  भोज।
ओहि  पर  चर्चा   सुनबय रोज।
बहुत  लोक केँ छन्हिं अवकाश।
झुण्ड  बना  कऽ  खेलथि  ताश।
महिला  सभहक  हाल, बेहाल।
कम्मे  लोक रखय छथि ख्याल।
मैथिल   मिथिला  नाम  बचाबू।
अप्पन अप्पन -----

सुनल, सुनाओल नहि छी बात।
भोगल   सत्य,   हृदय  आघात।
बचत   गाम  तऽ  बचतय  देश।
संस्कार    -    पूरित     परिवेश।
मैथिल   संस्कृति  केर  पहचान।
डेग  -  डेग   पर   पसरल  ज्ञान।
सुमन   ज्ञान   अविराम   बढ़ाबू।
अप्पन अप्पन -----

Wednesday, September 3, 2014

नमन हे पावन मिथिला देश

भाषा, बोली सब किछु मीठगर, प्रीत हमर संदेश।
नमन हे पावन मिथिला देश।।

जग जननी सीता केर जननी, सकल जगत मे नाम।
जतय अयोध्या सँ मोहित भऽ, आयल दुल्हा राम।
उगना बनिकय दौड़ल आयल, मिथिला स्वयं महेश।
नमन हे पावन मिथिला देश।।

स्वाभिमान सँ भरल अयाची, भेल कतेक विद्वान।
विद्यापति, मंडन केर धरती, बाँटल सगरो ज्ञान।
तंत्र मंत्र केर धरती मिथिला, गुरूकुल सम परिवेश।
नमन हे पावन मिथिला देश।।

पान, मखानक ई धरती छी, उपजय सगरो नीक।
लोक-वेद मिथिला-यश गाबथि, जिनका लागल ठीक।
ईश - प्रार्थना रहय नहि किनको, कहियो सुमन कलेश।
नमन हे पावन मिथिला देश।।