Sunday, August 21, 2022

मुदा आचरण के बिना

मूल्यवान सब जगत मे, सभहक प्रतिभा खास।
कियै  उड़ाबय  छी कियो, कमजोरक उपहास।।

पैघ सोच के  लोक सब, करय पैघ  सन काज।
सतत  विचारे  मे  छुपल, जीवन  के सब राज।।

धन दौलत जौं भेल तऽ, बनियो नहि भगवान।
आजुक निर्धन काल्हि केँ, सम्भव हो धनवान।।

सुखी हुनक जीवन तखन, जौं सम्बन्धक मोल।
सुख दुख मे जे सदरिखन, बाजथि मीठा बोल।।

ग्रन्थ  बहुत, गुरुओ  बहुत, बाँटि रहल उपदेश।
मुदा आचरण  के बिना, नहि  बदलत परिवेश।।

नीक  बात  बिनु  आचरण, बाजब  छी बेकार।
सुनियो  केँ सब नहि  सुनत, करैत रहू तकरार।।

बात  बुझू  वा  नहि  बुझू, नहि कोनो फरियाद।
प्रश्न  सुमन  के  स्वयं  सँ, अपनहि  सँ  सम्वाद।।

जागैत रहल नीनो मे चेतना हमर

हम गीत जतेक लिखलहुँ, छी वेदना हमर
जीवन  मे   भेल  बहुते,  अवहेलना  हमर
तैयो  सुमन जीबैत  रहल,  होश - जोश मे
जागैत   रहल  नीनो   मे,    चेतना   हमर

सोचू कनेक मन मे, किनक बात सुनय छी
सुनलाक बाद राह, अपन मन सँ चुनय छी
भेलहुँ असफल तऽ, देलहुँ दोसरे केर दोष
असगर मे बैसि रोज, अपन माथ धुनय छी

जिनगी लगल यै  बनकी, सबके पड़ोस मे
वो लोक भेटय कम्मे,  बिल्कुल जे होश मे
बुधियार  हम  स्वयं केँ, साबित  करैत छी
ऊपर  सँ  हँसी नकली,  भीतर  छी रोष मे

लागैया जिनगी नाटक, सब खेल रहल छी
सोचू जीबय छी सुख सँ, या झेल रहल छी
भेटत जे लोक बात, खाली  दु:ख के करत
लागैया  अपन  जिनगी,  बस ठेल रहल छी

धनिक बनल विद्वान

टाका! छी आजुक भगवान।
पूछत नहि कियो अरजल कोना, की की केलहुँ निदान??
टाका! छी आजुक -----

जिनका सँग  मे  जतबे  टाका, ओतबे लोक महान।
लोभक  कारण सब हुनके सँ, बढ़ाऽ रहल पहचान।।
टाका! छी आजुक -----

घर  भेटल  कम्मे  दुनिया  मे, सगरो  भेटल  मकान।
पढ़ल लिखल विद्वान कात मे, धनिक बनल विद्वान।।
टाका! छी आजुक -----

दूर  सत्य  सँ  लोक - वेद जौं, कानथि बैसि सुजान।
हँसी छी ओढ़ल मुदा हेरायल, सुमन सहज मुस्कान।।
टाका! छी आजुक -----

चारू तरफ शिकारी छै

अपने टा मुख्तारी छै
जीबय के लाचारी छै

बेसी लागल परनिंदा मे 
कम्मे लोक विचारी छै

दोसरो के भी बात सुनु
कियै लागय भारी छै 

सब ताकय कोना लूटी
चारू तरफ शिकारी छै

ज्ञानक मान दियौ सबकेँ 
नर चाहे ओ नारी छै

जिनगी तऽ कटबे करतै
सबकेँ अपन सवारी छै

कविता लिखता रोज सुमन
बहुत पैघ बीमारी छै

करियौ जोड़य के जतन

परिजन के सँग मिलिकय जीबी, सभहक आछि तैयारी।
देखलहुँ एक्के छत के नीचा, अछि विभेद बड़ भारी।
भैया! सोचू मोने मोन, करियौ जोड़य के जतन।।

स्नेह भेटल बचपन मे तखने, हम सब आगां बढ़लहुँ।
अप्पन क्षमता, प्रतिभा के बल, शिखर अपन सब चढ़लहुँ।
ओ परिजन सब आब लगैया, कियै पैघ दुश्मन?
भैया! सोचू मोने मोन ------

मातु पिता के त्याग समर्पण, कोना दाम चुकायब?
अहाँ के कारण कष्ट जौं हुनका, कत्तय मुँह छुपायब?
बाहर खूब लुटाबी पैसा, भाय, बहिन ठनठन।
भैया! सोचू मोने मोन -----

कलम उठेलहुँ फर्ज बूझिकय, प्रतिदिन लोक जगाबी।
बूझब नहि उपदेश कोनो छी, भोगल सत्य सुनाबी।
घर घर के ई हाल देखिकय, घायल भेल सुमन।
भैया! सोचू मोने मोन -----

अपना पर उपकार करय छी

हमहीं  टा  छी  ठीक  जगत मे, नित्य  एहेन व्यवहार करय छी
किछु  भरोस  लोको पर करियौ, व्यर्थ  कियै तकरार करय छी

सभहक ढंग जीबय केर अप्पन, छुपल जाहि मे अनुभव नूतन
जौं  सीखय  छी  हम  बच्चो  सँ, अपना पर उपकार करय छी

घर   के   मुर्गी  दालि  बराबर,  कहबी  केर  उपयोग  सरासर
मोल - हीन  घर  के  प्रतिभा  केँ, हम सब बारम्बार करय छी

कानय  छी  भगवान  पास  मे, दुख  हरता बस एहि आस मे
कर्म - भूमि  छी  धरती  अप्पन,  कर्मे  सँ  इन्कार  करय  छी

हम  ताकय  छी  गलती बाहर, सुमन जे पैसल अपने भीतर 
जीवन हुनक सफल हेतय जौं, दोष अपन स्वीकार करय छी

नूतन रोज विचार बनाबी

चलू, नया संसार बनाबी
दुश्मन तक केँ यार बनाबी

सिकुड़ि रहल अपनापन देखू
किछुओ किछ विस्तार बनाबी

अप्पन दोषक नित्य परीक्षण
दोसर केँ बुधियार बनाबी

छोड़ू अनुभव तीत-मीठ के
नूतन रोज विचार बनाबी

दया सँ बेसी प्रेम जरूरी
बस प्रेमक आधार बनाबी 

भ्रमवश छोट बुझि किनको पर
कहियो नहि अधिकार बनाबी

बच्चा सहित सुमन परिजन पर
नित्य नित्य बस प्यार बनाबी