Thursday, March 29, 2012

तखने जीयब शान सँ

समय के सँग मे डेग बढ़ाबी, तखने जीयब शान सँ
किछु ऊपर सँ रोज कमाबी, तखने जीयब शान सँ

काका, काकी, पिसा, पिसी, रिश्ता भेल पुरान यौ
कहुना हुनका दूर भगाबी, तखने जीयब शान सँ

सठिया गेला बूढ़ लोक सब, 
हुनका बातक मोल की
हुनको नवका पाठ पढ़ाबी, तखने जीयब शान सँ

सासुर अप्पन, कनिया, बच्चा, एतबे टा पर ध्यान दियऽ
बाकी सब सँ पिण्ड छोड़ाबी, तखने जीयब शान सँ

मातु-पिता केर
 चश्मा टूटल, कपड़ा छय सेहो फाटल
कनिया लय नित सोन गढ़ाबी, तखने जीयब शान सँ

पिछड़ल लोक बसय
मिथिला मे, धिया-पुता सँ कहियो
अंगरेजी मे रीति सिखाबी, तखने जीयब शान सँ

सुमन दहेजक निन्दा करियो, बस बेटी
 वियाह मे
बेटा बेर मे खूब गनाबी, तखने जीयब शान सँ

4 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. श्यामल
    आशीर्वाद
    बहुत ही पीड़ा का वर्णन गजल में
    यही समझ आया

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  3. bahut lajabaab ghazal hai kafi kuch samajh bhi aa gai kintu is pankti ka hindi anuvaad kar den to aabhar hoga

    बेटा बेर मे खूब गनाबी तखने जीयब शान सँ

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  4. naya swad accha laga..poora poora nahi samajh paa raha hoon.kuch andaj lagane ke koshis kee ..accha laga.sadar badhayee aaur amantran ke sath

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